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उत्तराखंड में सबसे अलग होती है चंपावत की होली, चंद राजवंश से जुड़ा है इतिहास

देवभूमि उत्तराखंड की प्राकृतिक छटा जितनी समृद्ध है, उतना ही यहां का इतिहास भी समृद्ध है. उत्तराखंड में मनाए जाने वाले हर त्यौहार में यहां की संस्कृति और इतिहास की झलक मिलती है. वैसे तो रंगों का पर्व होली (Holi 2024) पूरे देश में मनाई जाती है. लेकिन, चंपावत जिले में मनाई जाने वाली होली उत्तराखंड के इतिहास से जुड़ी है.

उत्तराखंड में कुमाऊंनी होली की शुरुआत तो 15वीं शताब्दी में चंपावत के चंद राजाओं के महल और काली कुमाऊं सुई क्षेत्रों से मानी जाती है, जो चंद राजवंश के प्रसार के साथ ही यह सम्पूर्ण कुमाऊं क्षेत्र तक फैली है. कुमाऊं की इस होली का इतिहास 500 साल से ज्यादा पुराना है. ढोल की थाप के साथ, कदमों की चहलकदमी और राग-रागिनियों का समावेश कुमाऊं की खड़ी होली में होता है. कुमाऊं में चंपावत के साथ ही अन्य जिले पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, बागेश्वर में भी कुमाऊंनी होली का आयोजन किया जाता है.

15वीं शताब्दी से कुमाऊं में होली हुई लोकप्रिय

कुमाऊं में होली 15वीं शताब्दी में महान चंद शासकों द्वारा लोकप्रिय बनाई गई. चंद शासकों की आरंभिक राजधानी चंपावत थी, जहां होली का काफी प्रचार प्रसार किया गया. 16वीं शताब्दी में उन्होंने अपनी राजधानी अल्मोड़ा स्थानांतरित की और सम्पूर्ण कुमाऊं को एकता के सूत्र में बांधकर उन्होंने सांस्कृतिक मान्यताओं को सम्पूर्ण क्षेत्र में प्रसारित कर दिया.

ब्रज से जुड़ी है चंपावत की होली
चंपावत से नैनीताल पहुंचे होल्यार नगेंद्र कुमार जोशी बताते हैं कि चंपावत में जब चंद राजाओं का राज था, तो उनके राज-दरबार में 14 लोग ब्रज से आए थे. उन्होंने यहां पर ब्रज की होली का गायन किया. तब से चंपावत में गायी जाने वाली होली में ब्रज की होली की झलक देखने को मिलती है. चंपावत में निवास करने वाला चौबे समाज स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण के वंशज के रूप में देखता है. माना जाता है कि चौबे समाज के लोग ही ब्रज की होली को चंपावत लेकर आए थे.

बेहद खास है खड़ी होली
चंपावत की खड़ी होली बेहद लोकप्रिय है. ज्यादातर यह होली मंदिर परिसर से प्रारंभ होती है. होल्यार शोभायात्रा में सम्मिलित होकर, पारंपरिक कुमाऊनी वेशभूषा के रूप में सफेद कुर्ता, पायजामा और सिर पर सफेद पहाड़ी टोपी पहनकर होली खेलने आते हैं. होल्यार हुड़के और ढोल की थाप पर नृत्य करते हैं और कुमाऊंनी लोक गथाओं को होली के माध्यम से गाते हैं. इसके साथ ही चंपावत का चौबे समाज हाथों में भगवान श्री कृष्ण को बेहद प्रिय मोर पंख लेकर पारंपरिक वेशभूषा में श्री कृष्ण से जुड़ी ब्रज की होली का गायन करते हैं.

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