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गरीब बच्चों में शिक्षा की अलख जगा रहे नवेंदु मठपाल, बिना सरकारी सहायता के खोले दो स्कूल

नवेंदु मठपाल ने विषम परिस्थियों में भी हिम्मत नहीं हारी. लोगों के विरोध को बर्दाश्त कर शिक्षा की ज्योति फैलाने में लगे रहे. साथियों की मदद से दो स्कूल खोलने में कामयाब हो गए.

 रामनगर के रहने वाले नवेंदु मठपाल ने गरीब बच्चों में शिक्षा की अलख जगाने का बीड़ा उठाया है. उन्होंने साथियों की मदद से रचनात्मक शिक्षण मंडल नाम का संगठन बनाया. रचनात्मक शिक्षण मंडल गरीब और असहाय बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहा है. नवेंदु मठपाल बताते हैं कि शुरू में लोगों का विरोध भी झेलना पड़ा. उन्होंने बताया कि बढ़ाने के लिए झोपड़ीनुमा स्कूल बनाया. लोगों ने स्कूल को तोड़ दिया. कई बार बाढ़ में स्कूल बह गया. विषम परिस्थितियों में भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी.

शिक्षा की अलख जगाने का उठाया बीड़ा

कड़ी मेहनत से दोबारा स्कूल खड़ा कर दिया. आज स्कूल में ढाई सौ बच्चे पढ़ रहे हैं. रचनात्मक शिक्षण मंडल के सदस्य ड्रॉपआउट की समस्या भी दूर कर रहे हैं. पढ़ाई छोड़ चुके बच्चों के परिजनों को शिक्षा का महत्व बताया जाता है. सदस्य परिजनों से बच्चों को स्कूल भेजने की अपील करते हैं. स्कूल को सरकारी मदद नहीं मिलती है.

खुद के खर्चों से स्कूल का संचालन शिक्षक कर रहे हैं. स्लम एरिया से आने वाले बच्चे शिक्षा ले रहे हैं. प्राइमरी स्कूल से लेकर डिग्री कॉलेज तक के शिक्षक बच्चों को पढ़ा रहे हैं. रचनात्मक शिक्षण मंडल अब तक दो स्कूलों को खोल चुका है. एक स्कूल रामनगर के पुछडी क्षेत्र में खोला गया है. दूसरा रामनगर के सबसे पिछड़े गांव पटरानी में चल रहा है. दोनों ही इलाकों में अभी तक सरकारी स्कूलों की सुविधा नहीं पहुंच पाई है. लोगों को सड़क जैसी मूलभूत सुविधा भी नसीब नहीं है.

स्लम एरिया के बच्चों को स्कूल से जोड़ा

इलाके में शहर का कचरा डाला जाता है. लोग ज्यादातर कोसी नदी में मजदूरी का काम करते हैं. मकान टीन टप्पर से जोड़कर बने हुए हैं. बच्चों के पास ना तो ढंग के के कपड़े हैं और ना ही पैरों में चप्पल है. रामनगर से 10 किलोमीटर दूर बसे नदी किनारे पूछडी गांव में स्थित स्कूल के संस्थापक नवेंदु मठपाल बताते हैं कि शिक्षा का मंदिर खोलना आसान नहीं था. शुरू- शुरू में काफी परेशानी का सामना करना पड़ा. बच्चों की शिक्षा की बात से लोग चिढ़ने लगे थे.

आसान नहीं था परिजनों को समझाना 

बच्चों को मजदूरी से हटाकर शिक्षा की ओर लाना आसान नहीं था. बड़ा होने पर मां-बाप बच्चों को काम पर लगा देते हैं. एक बच्चा रोजाना 30 से 40 रुपए घर लेकर आता है. घर का खर्च चलाने में बच्चों की आमदनी सहायक होती है. स्कूल खुलने के बाद कई बार लोगों ने तोड़ दिया. लोगों को स्कूल खुलने से दिक्कत होने लगी थी. संगठन के सदस्यों ने लोगों को समझाना शुरू किया. धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ती गई. स्कूल में 200 से 300 बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं.

ढाई सौ बच्चों को अलग-अलग स्कूलों में एडमिशन भी कराए गए हैं. उन्होंने बताया कि संगठन का मकसद हर बच्चे तक शिक्षा पहुंचाना है. खुद के खर्चे से स्कूल का संचालन किया जा रहा है. कॉपी किताब और ड्रेस की व्यवस्था लोगों के चंदे से पूरी की जाती है. ठंड में स्वेटर भी बच्चों को दिया जाता है. शिक्षा के क्षेत्र में नवेंदु मठपाल की पहल सराहना योग्य है.

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